[] नज़्म : 11- सफ़ाई

हॅंस रहा हूॅं मैं जो ग़म से रोज़ खेला इसलिए ।। ख़ुश है वो उसने न अब तक दर्द झेला इसलिए ।। कितने लोगों से मोहब्बत के लिए हुमका ये दिल ? जिस्म का जुग़्राफ़िया कितनों का भाया ऑंख को...Read more

मुक्तक : 1022 – मंच

अब नसीहत के लिए लिखने में है ख़तरा बहुत , अब जरीआ ये नहीं हरगिज़ रही तम्बीह का ।। जिसको पढ़-सुन बस हॅंसी ही आए वो ही वो लिखो , रंच भर भी उसमें पुट चाहे रहे न सहीह का...Read more

मुक्तक : 1021 – अज़्म

मैं उधड़ता और फटता ही रहूॅं लेकिन ये है , ख़ुद को ख़ुद ही जिस तरह भी बन पड़े सीता चलूॅं ।। प्यास को अपनी मयस्सर ना रहे पानी अगर , अपने ऑंसू ही पसीने में मिला पीता चलूॅं ।।...Read more

मुक्तक : 1020 – यारियाॅं

कुत्ते से अजनबी को तक चुप रहा न जाए ।। मालिक की भी सुने ना जब भौंकने पे आए ।। चोरों से पहरेदारों की यारियों को समझो , ऑंखों से यूॅं ही कोई अंजन चुरा न पाए ।। -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 1019 – फ़ैसला

यूॅं ही खड़ा हुआ था मैं किसी को देखता , वो भी निगाह मुझपे ही जमाए था खड़ा ।। मेरी नज़र जमी थी उसके ढलवाॅं हुस्न पर , वो तक रहा था क़द मेरा बुलंद औ’ बड़ा ।। मैं उसको...Read more

मुक्तक : 1018 – लिखता रहूॅं

काग़ज़ों पर ही सही हाॅं मगर महब्बत से , झोपड़ी को भी हमेशा महल की सूरत दूॅं ? बिखरी किरचों को सड़क के बबूली काॅंटों को , चुनके पलकों से गुलाबी कमल की सूरत दूॅं ? कौन समझेगा कि ख़ुद...Read more