● ग़ज़ल : 297 – ख़्वाब

न ज़मज़म का न गंगा का , न पानी दो चनाबों का ।। मुझे जो प्यास है , लाज़िम उसे दर्या शराबों का ।। हाँ ! अनपढ़ हूँ मगर हैरानगी की बात क्या इसमें , जो सौदागर हूँ मैं इस...Read more