न ज़मज़म का न गंगा का , न पानी दो चनाबों का ।।
मुझे जो प्यास है , लाज़िम उसे दर्या शराबों का ।।
हाँ ! अनपढ़ हूँ मगर हैरानगी की बात क्या इसमें ,
जो सौदागर हूँ मैं इस शह्र में महँगी किताबों का ?
कटेरी भी तो ख़ुश रहती है काँटों में मगर बोलो ,
किया करते हो तुम क्यों ज़िक्र बस हँसते गुलाबों का ?
ज़रूरत पेश क्या आई फ़क़त इक शम्अ की मुझको ,
ज़ख़ीरा तुमने क्यों फ़ौरन ही बख़्शा आफ़्ताबों का ?
लगा हूँ रात-दिन सपने सँजोने में तुम्हारे मैं ;
क्या जाने हूँ न निकलेगा कचूमर मेरे ख़्वाबों का ?
बदलकर भेस को अपने , न लेकर ओट पर्दे की ;
मैं कारोबार करता हूँ , दिखा चेह्रा , नक़ाबों का ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *