अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
न टुक भी जिससे दिल को जोड़ना था ,
हमेशा जिससे मुँह बस मोड़ना था ,
जिसे तकते ही आँखें फोड़ना था ,
उसी उसका नज़ारा कर रहा हूँ ।।
अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
कभी जिससे मैं जुड़ना चाहता था ,
मैं जिसके साथ उड़ना चाहता था ,
नहीं हरगिज़ बिछुड़ना चाहता था ,
उसी से अब किनारा कर रहा हूँ ।।
अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
बताओ ! क्या हुनर ऐसा कहीं है ,
सभी कहते हैं वो बंजर ज़मीं है ,
जहाँ काँटे तलक होते नहीं हैं ,
वहाँ मैं फूल पैदा कर रहा हूँ ।।
अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
सही जिसकी थी हर इक चोट अब तक ,
छिपाए जिसके सारे खोट अब तक ,
हमेशा देके अपनी ओट अब तक ,
उसी को आज नंगा कर रहा हूँ ।।
अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
मिला ज्यों ही उसे कोई भी मौक़ा ,
दिया है उसने फ़ौरन छुपके धोखा ,
न जाने क्या है उसमें जो भरोसा-
उसी पर फिर मैं पूरा कर रहा हूँ ?
अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
ग़रीबी इस क़दर हावी है मुझ पर ,
नहीं जो कोई भी चीज़ अब मेरे घर ,
मैं सामाँ की जगह ख़ुद को ही रखकर ,
सरेबाज़ार बेचा कर रहा हूँ ।।
अरे देखो मैं ये क्या कर रहा हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

 

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