काग़ज़ों पर ही सही हाॅं मगर महब्बत से ,

झोपड़ी को भी हमेशा महल की सूरत दूॅं ?

बिखरी किरचों को सड़क के बबूली काॅंटों को ,

चुनके पलकों से गुलाबी कमल की सूरत दूॅं ?

कौन समझेगा कि ख़ुद मैं न जान पाया जब ,

क्यों किए जाऊॅं मैं दिन-रात बिन थके ये सब ,

क़हक़हाज़ार हो लिखता रहूॅं हमेशा ग़म ;

और ख़ुशियों को बिलखकर ग़ज़ल की सूरत दूॅं ?

-डॉ हीरालाल प्रजापति

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