मैं उधड़ता और फटता ही रहूॅं लेकिन ये है ,
ख़ुद को ख़ुद ही जिस तरह भी बन पड़े सीता चलूॅं ।।
प्यास को अपनी मयस्सर ना रहे पानी अगर ,
अपने ऑंसू ही पसीने में मिला पीता चलूॅं ।।
देख जब हालात की जल्लाद सी कुछ सख़्तियाॅं ,
इस क़दर मायूस हो जाऊॅं कि दिल में बस मियाॅं –
इससे पहले ख़ुदकुशी का अज़्म हो पैदा कहीं ,
मैं अगर मरता भी होऊॅं तो वहीं जीता चलूॅं ।।
( मयस्सर = उपलब्ध /मियाॅं = महाशय /अज़्म = संकल्प )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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