अब नसीहत के लिए लिखने में है ख़तरा बहुत ,

अब जरीआ ये नहीं हरगिज़ रही तम्बीह का ।।

जिसको पढ़-सुन बस हॅंसी ही आए वो ही वो लिखो ,

रंच भर भी उसमें पुट चाहे रहे न सहीह का ।।

मत करो संजीदगी की बात सच कहता हूॅं मैं ,

बस लतीफ़ागोई करना सीख लो रट चुटकुले ,

मंच पर अब नक़्लची और मस्ख़रों का दौर है ,

शायरी ख़ालिस वसीला आजकल तफ़्रीह का ।।

( जरीआ =माध्यम / तम्बीह =चेतावनी / सहीह =सत्य / लतीफ़ागोई =चुटकुलेबाजी / ख़ालिस =विशुद्ध  / वसीला =साधन / तफ़्रीह =मनोरंजन )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *