हॅंस रहा हूॅं मैं जो ग़म से रोज़ खेला इसलिए ।।

ख़ुश है वो उसने न अब तक दर्द झेला इसलिए ।।

कितने लोगों से मोहब्बत के लिए हुमका ये दिल ?

जिस्म का जुग़्राफ़िया कितनों का भाया ऑंख को ?

शख्स़ियत कितनों की मुझको खेंचती लंबा रही ?

जाने कितनों की अदाओं पर मैं था जाॅं से फ़िदा ?

हाय शायद हूॅं अभी तक मैं अकेला इसलिए ।।

मुझ पे मॅंडलाती रहीं कितने दिनों तक बदलियाॅं ?

अब्र फट पड़ने को मुझ पर रात दिन बेताब थे ,

बदलियों से कह रहा था कान में जब कोई यह-

“मैं हूॅं रेगिस्तान” यह बादल ने भी छुप सुन लिया ;

मुझको तज नदियों में जा पहुॅंचा वो रेला इसलिए ।।

बचपने के मुझमें बचपन में भी कब थे कुछ निशाॅं ?

कमसिनी में भी बुज़ुर्गाना मेरा क्यों तौर था ?

अपनी नंगी मुफ़्लिसी को ढाॅंपने के वास्ते ;

अपने पापी पेट को ख़ुद पालने को क्या कहूॅं ?

काम ही करता रहा हरगिज़ न खेला इसलिए ।।

कौन है , कैसा है अब मुझ को बख़ूबी है पता ,

अब नहीं आसाॅं पटकना मुझको धोखा दे यहाॅं ,

लड़खड़ा कर भी चलूॅं अब तो भी मैं गिरता नहीं ,

तब सॅंभल कर चलके भी कुछ खा गया था ठोकरें ,

शह्र में उस वक़्त था मैं इक नवेला इसलिए ।।

( अब्र =मेघ / जुग़्राफ़िया =भूगोल / मुफ़्लिसी =निर्धनता / नवेला =नया )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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