सतपुड़ा के पहाड़ों सा कब से खड़ा ,

वक़्त सा अब थके बिन चला जा रहा ।।

मरघटी चुप्पियों से उलट कृष्ण की ,

बाॅंसुरी सी मधुर धुन बना जा रहा ।।

देख रद्दोबदल मुझमें ऐसा सभी ,

सख़्त हैराॅं हो “क्यों” ? पूछते जब कभी ;

मैं कहूॅं बस यही ” इश्क़ में हूॅं ” तभी ,

झाड़ियों से मैं गुलशन हुआ जा रहा ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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