खिलने से ही पहले मुरझाया ;

मैं कैसा खिलने वाला हूॅं ?

हर रोज़ क़तार में लग-लगकर ,

महॅंगे से मेरा महॅंगा सामाॅं ,

दूकान बढ़ाने से पहले ,

सब लोग ख़रीद-फरोख्त़ करें ।

कुछ रोज़ से मैं सामाॅं की जगह ,

ख़ुद को रख बेचने बैठा हूॅं ,

हैरान हूॅं तब से आज तलक ,

मुझको न खरीदने इक आया ;

मैं कैसा बिकने वाला हूॅं ?

चिथड़े-चिथड़े उधड़े कपड़े ,

कर तुरपाई बारीक रफ़ू ,

कर देता हूॅं उनको फिर से ,

महफ़िल में पहनने के लाइक़ ।

मैंने दर्जी की खोली है –

दूकान , मगर कुछ सिलवाने ,

इंसान तो क्या अब तक उसका ,

आया न फटकने को साया ;

मैं कैसा सिलने वाला हूॅं ?

सच कहता हूॅं खा जान क़सम ,

ऑंखें अपनी फाड़े दुनिया ,

देखे है उन्हें भी मोहब्बत से ,

जो नकटे , बूचे , अंधे हैं ।

जब भी निकला मैं सड़कों पर ,

कर-कर सारे सिंगार मगर ,

बदशक्लों को भी न जाने क्यों ,

मैं फूटी ऑंख नहीं भाया ?

मैं कैसा दिखने वाला हूॅं ?

पूरी धरती के काग़ज़ भर ,

सच्ची अफ़्सानानिगारी की ,

ग़ज़लें भी कहीं ,गा गीत दिए ,

इक अर्सा लतीफ़ागो भी रहा ।

जब-जब जो-जो भी लिखना था ,

मैंने वह दिल से ख़ूब लिखा ,

अफ़्सोस मुझे पढ़ने वाला ,

अब तक भी न कोई मिल पाया ;

मैं कैसा लिखने वाला हूॅं ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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