उसके लिए जो लाखों में है बस हमीदा* इक ।।
मैं काढ़ने लगा हूॅं रात दिन क़सीदा* इक ।।
दुनिया में उससा दूसरा कहीं नहीं है सच ,
बेमिस्ल है , वो लाजवाब वो फ़रीदा* इक ।।
माना कि उसने ख़ुद ही ज़ह्र खाके जान दी ,
लेकिन मुझे यक़ीन है , है वो शहीदा* इक ।।
लगते ही बस हैं ठहरे-ठहरे वो पहाड़ से ,
दरअस्ल अपने आप से हैं वो रमीदा* इक ।।
हूॅं आज तो मैं नारियल सा लटका पेड़ पर ,
हो जाउॅंगा कल आम की तरह चकीदा* इक ।।
देखेंगे मुझको ग़ौर से तो कह उठेंगे सब ,
कोरा नहीं हूॅं , हाॅं ! हूॅं रंग ए परीदा* इक ।।
( हमीदा =उत्तम स्त्री  / क़सीदा =पद्यमयी प्रशंसा  / फ़रीदा =अकेला, अद्वितीय  / शहीदा =अन्य के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाली  / रमीदा =पलायन करने वाला  / चकीदा =टपका हुआ  / रंग ए परीदा =जिसका रंग उड़ गया हो )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

This article has 4 comments

  1. Sunil sharma Reply

    बेहतरीन लाजबाब डॉ.साहब 💐💐

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