∆ ग़ज़ल : 299 – मुंतज़िर

ख़ुदकुशी से ख़ुद को ऐसे रोकता खड़ा रहा ।। सुब्हो-शाम , रात-दिन शराब पी पड़ा रहा ।। मुझसे मिलने कह गया था जिस जगह वो आएगा , मुंतज़िर मैं उस जगह पे उम्र भर खड़ा रहा ।। वो अड़ा रहा...Read more