ख़ुदकुशी से ख़ुद को ऐसे रोकता खड़ा रहा ।।
सुब्हो-शाम , रात-दिन शराब पी पड़ा रहा ।।
मुझसे मिलने कह गया था जिस जगह वो आएगा ,
मुंतज़िर मैं उस जगह पे उम्र भर खड़ा रहा ।।
वो अड़ा रहा तमाम उम्र अपनी बात पर ,
मैं भी अपनी ज़िद पे मरते दम तलक अड़ा रहा ।।
एक किरकिरी रहा मैं हाय उसकी ऑंख को ,
और तीर बनके मेरे दिल में वो गड़ा रहा ।।
जब निगाह में था उसकी मैं अज़ीम सच कहूॅं ,
वो मेरी नज़र में रब से भी कहीं बड़ा रहा ।।
अपने दम पे ही रहा वो बन के शाही पैरहन ,
और अपनी वज़्ह ही मैं सिर्फ़ चीथड़ा रहा ।।
बन गया वो मिट्टी के दिये से सोने का कलश ,
मैं घड़ा था मिट्टी का व मिट्टी का घड़ा रहा ।।
( ख़ुदकुशी = आत्महत्या / मुंतज़िर = प्रतीक्षारत / अज़ीम = महान / शाही पैरहन = राजसी वस्त्र / वज़्ह = कारण )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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