तुम फलोदी को क्या चिकमगलूर कर दोगे ?
सादा पानी आब ए अंगूर कर दोगे ?
मैं बता दूॅंगा उदासी का सबब लेकिन ,
क्या उदासी फिर मेरी तुम दूर कर दोगे ?
रात दिन चाहूॅंगा तुमको जीते जी मर-मर ,
प्यार की दरख्व़ास्त क्या मंज़ूर कर दोगे ?
मुझसे बेकारों से “क्या करते हो ?” ऐसा पूछ ,
क्या किया सारा नशा काफ़ूर कर दोगे ?
मैं हथौड़ा हूॅं मगर हूॅं काॅंच का , मुझसे-
ठोंककर कीलें क्या चकनाचूर कर दोगे ?
तुम हसद से उसको ख्व़ाबों में भी हॅंसते देख ,
क्या हक़ीक़त जा बता रंजूर कर दोगे ?
रात-दिन लिखवा रहे हो कृष्ण पद मुझसे ,
क्या मुझे रसखान-मीरा-सूर कर दोगे ?
( फलोदी = राजस्थान का एक शुष्क नगर  / चिकमगलूर = कर्नाटक का एक हिल स्टेशन  / आब ए अंगूर = शराब  / हसद = ईर्ष्या  / रंजूर  = दुखित  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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