जागते-सोते या चल या थम नहीं देता ।।
हाॅं ! मुझे अब कोई भी ग़म ; ग़म नहीं देता ।।
वो मुझे कुछ भी कभी भी और फ़ौरन ही ,
जितना माॅंगूॅं उससे टुक भी कम नहीं देता ।।
हैं बहुत दुश्मन मेरे हैं दोस्त भी काफ़ी ,
पर मुझे रब एक भी बालम नहीं देता ।।
अब मुझे तनहा पकड़ जब्रन चखाता है ,
अब बहारों का मज़ा मौसम नहीं देता ।।
है बुरी दारू न दे भर-भर सुराही पर ,
किसलिए तू बूॅंद भर ज़मज़म नहीं देता ?
हाॅं वो देता है यक़ीनन ख़ूब देता है ,
पर न सबको और फिर हरदम नहीं देता ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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