नज़र का मेरी उसकी नज़रों से जाकर ,
हुआ एक लम्हा ही धोखे से लड़ना ।।
ठिठक कर उसे देखकर एक दम में ,
हुआ पूरे इक सौ दफ़्आ चौंक पड़ना ।।
उधर उसका मुझको बड़े ग़ैज़ में भर ,
निगाहों को ख़ूॅं की तरह लाल कर-कर ,
हुआ ही था बस घूरना और इधर पर ;
मेरे दिल में जैसे हुआ तीर गड़ना ।।
( लम्हा = क्षण / दम = पल / ग़ैज़ = क्रोध )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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