मुक्तक : 1037 – तेरा ग़म

आरी से जैसे कोई लकड़ी को काटता है , पत्थर पे जैसे कोई चटनी को बाटता है , जैसे कि खाए गेहूॅं को घुन कुतर-कुतर कर , ग़म तेरा मुझको वैसे दीमक सा चाटता है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

∆ ग़ज़ल : 303 – हाथ मलते हैं

दिल में बस इक-दो नहीं ग़म लाख पलते हैं ।। ऑंख से ऑंसू न अलबत्ता निकलते हैं ।। लोग घूमें घर में मोटर-कार में बैठे , और हम पैदल भी मीलों-मील चलते हैं ।। हमसे फूलों का कुचलना भी नहीं...Read more

मुक्तक : 1036 – बशर्ते

बाग़ से फूलों के जैसे मैं ज़मीं से , आस्माॅं से दिन में तारे तोड़ देता ।। मोमबत्ती जैसे फ़ौलादी सलाखें , चुटकियों में हॅंसते-हॅंसते मोड़ देता ।। हाॅं ! बशर्ते मुझसे वो कहते लजाकर , ज़िद पे अड़के ,...Read more

मुक्तक : 1035 – चटाक

ख़ुद को टकराए ख़ुद ही पहले पत्थरों से फिर , काॅंच जैसा चटाक से वो टूट रोता है ।। क़ैद से भागने के ख़्वाब देखता है फिर , अपने पिंजरे से हैराॅं हूॅं वो छूट रोता है ।। देखने में...Read more

मुक्तक : 1034 – जंगल

उसे कब न ऑंखों के हाथों से रोका , मगर वो चले ही चले दौड़-पैदल ; कुल्हाड़ी ले इक हाथ में दूसरे में , धुऍं को लिए साथ में जलती मश्अल , उठाए क़सम सिर पे घर से ये “गिन-गिन...Read more

मुक्तक : 1033 – रद्दी

हम क्यों न रख सके दबा-छुपा के अपना राज़ ; पत्तों से सब की ऑंख से , झड़े तभी हैं आज ? ज़िंदों को भी भला करे है दफ़्न कोई यार , हम मर चुके ज़मीन में , गड़े तभी...Read more