मुक्तक : 1027 – इंतिज़ार

गर्मी में आग जैसी सुलगती ज़मीन पर , नंगे ही पाॅंव देर तलक गुम खड़ा रहा ।। फिर लेटकर दरख़्त के साए में दोपहर , उसके हसीं ख़यालों में डूबा पड़ा रहा ।। आने का कह वो जाता था जिस...Read more