गर्मी में आग जैसी सुलगती ज़मीन पर ,

नंगे ही पाॅंव देर तलक गुम खड़ा रहा ।।

फिर लेटकर दरख़्त के साए में दोपहर ,

उसके हसीं ख़यालों में डूबा पड़ा रहा ।।

आने का कह वो जाता था जिस जा उसी जगह ,

सच उसके इंतिज़ार में सदबार बेतरह ,

ये मान वो ज़रूर ही आएगा मुद्दतों ,

खंभे सा मैं बग़ैर हिले बस गड़ा रहा ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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