उदासी से है इस क़दर इश्क़ लब पर ,

ख़ुशी में भी हरगिज़ तबस्सुम न लाऊॅं ।।

अज़ीज़ इस क़दर सख्त़ काॅंटे कि उसको ,

दूॅं सौग़ात तो नर्म क़ुर्तुम न लाऊॅं ।।

सियह रात कर दोपहर जुगनू जाते ;

अंधेरे इन आंखों को तब चौंधियाते ;

फ़क़त इसलिए बोगदे में भी अपने ,

मैं सूरज , मैं चंदा , मैं अंजुम न लाऊॅं ।।

( तबस्सुम =मंद हास्य  / क़ुर्तुम =फूल  / बोगदा =अंधेरी सुरंग  / अंजुम =तारे )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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