सोचता हूॅं कभी – कभार होश में पूरे ,
मुझको सबने ही बेवुक़ूफ़ क्यों बना डाला ?
मैंने पाया जवाब लेके हाथ में अपने ,
एक बोतल शराब एक काॅंच का प्याला ।।
जागती ऑंख को बड़े – बड़े दिखा सपने ,
क्यों न करता ज़माना साथ में दग़ा अपने ?
एक तो दिल नहीं दिमाग़दार था अपना ;
उसपे तुर्रा दिमाग़ भी था अपना दिलवाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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