मुक्तक : 1030 – हीर

तुम्हारी याद का इक ज़ह्र में बुझा कोई , न मुझमें तीर एक मुस्तक़िल गड़ा होता ।। कमी ही आती ग़म ए दिल में कुछ न कुछ पल-पल , जिगर का दर्द न फिर दिन-ब-दिन बड़ा होता ।। मगर किया...Read more