तुम्हारी याद का इक ज़ह्र में बुझा कोई ,
न मुझमें तीर एक मुस्तक़िल गड़ा होता ।।
कमी ही आती ग़म ए दिल में कुछ न कुछ पल-पल ,
जिगर का दर्द न फिर दिन-ब-दिन बड़ा होता ।।
मगर किया था मुझे तुमने प्यार कुछ ऐसा ,
किया था हीर ने राॅंझे से ठीक उस जैसा ,
जो मुझसे तुमने कहीं बेवफ़ाई की होती ,
बिछड़ के तुमसे तुम्हें भूलना पड़ा होता ।।
( मुस्तक़िल = चिरस्थायी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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