∆ ग़ज़ल : 302 – ग़ज़लकार

मैं फिर कहता हूॅं मेरी बात पर करने यक़ीं साहिब ।। है बेशक़ शौक़ लिखने का मगर मैं हूॅं नहीं कातिब ।। न बोलें हम उसे बेगार तो क्या नाम दें कहिए ; किये जिसके कभी मिलते नहीं इन्आम या...Read more