मैं फिर कहता हूॅं मेरी बात पर करने यक़ीं साहिब ।।

है बेशक़ शौक़ लिखने का मगर मैं हूॅं नहीं कातिब ।।

न बोलें हम उसे बेगार तो क्या नाम दें कहिए ;

किये जिसके कभी मिलते नहीं इन्आम या रातिब ?

मैं सच कहता हूॅं , हाॅं ! बख़ुदा , मैं जितना तुम पे मरता हूॅं ,

मगर हासिल तुम्हें करने का मैं उतना नहीं तालिब ।।

बिछड़ कर तुमसे मैं चल तो रहा हूॅं रात-दिन लेकिन ,

न जानूॅं है कहाॅं जाना औ’ जाऊॅं कौन सी जानिब ?

मैं कहता हूॅं ग़ज़ल अच्छी मगर मुझको नहीं भाता ,

कि कोई प्यार से भी मुझको बोले मीर या ग़ालिब ।।

मिलेगा मुफ़्त ही सब कुछ या फिर महॅंगा मिलेगा याॅं ,

किसी भी माल की क़ीमत यहाॅंं मिलती नहीं वाज़िब ।।

( कातिब =ग्रंथकार ,लेखक  / रातिब =रोज़ की ख़ुराक़ ,वेतन ,पारिश्रमिक  /

तालिब =इच्छुक ,लालायित  / जानिब =ओर ,दिशा )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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