मुक्तक : 1033 – रद्दी

हम क्यों न रख सके दबा-छुपा के अपना राज़ ; पत्तों से सब की ऑंख से , झड़े तभी हैं आज ? ज़िंदों को भी भला करे है दफ़्न कोई यार , हम मर चुके ज़मीन में , गड़े तभी...Read more