हम क्यों न रख सके दबा-छुपा के अपना राज़ ;

पत्तों से सब की ऑंख से , झड़े तभी हैं आज ?

ज़िंदों को भी भला करे है दफ़्न कोई यार ,

हम मर चुके ज़मीन में , गड़े तभी हैं आज ?

आसानियों से आते ही रहे सभी के हाथ ,

नादान थे बने रहे सरल खुली किताब ;

लोगों ने हम को पढ़ लिया न जाने कितनी बार ,

रद्दी की टोकरी में बस , पड़े तभी हैं आज ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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