मुक्तक : 1034 – जंगल

उसे कब न ऑंखों के हाथों से रोका , मगर वो चले ही चले दौड़-पैदल ; कुल्हाड़ी ले इक हाथ में दूसरे में , धुऍं को लिए साथ में जलती मश्अल , उठाए क़सम सिर पे घर से ये “गिन-गिन...Read more