मुक्तक : 1035 – चटाक

ख़ुद को टकराए ख़ुद ही पहले पत्थरों से फिर , काॅंच जैसा चटाक से वो टूट रोता है ।। क़ैद से भागने के ख़्वाब देखता है फिर , अपने पिंजरे से हैराॅं हूॅं वो छूट रोता है ।। देखने में...Read more