ख़ुद को टकराए ख़ुद ही पहले पत्थरों से फिर ,

काॅंच जैसा चटाक से वो टूट रोता है ।।

क़ैद से भागने के ख़्वाब देखता है फिर ,

अपने पिंजरे से हैराॅं हूॅं वो छूट रोता है ।।

देखने में वो एक आम आदमी लगता ,

उससा लेकिन अलाहदा न कोई हो सकता ;

ग़म में हॅंसने का फ़न उसी से सीखने जाऊॅं ,

हो ख़ुशी में भी ग़मज़दा वो फूट रोता है ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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