बाग़ से फूलों के जैसे मैं ज़मीं से ,

आस्माॅं से दिन में तारे तोड़ देता ।।

मोमबत्ती जैसे फ़ौलादी सलाखें ,

चुटकियों में हॅंसते-हॅंसते मोड़ देता ।।

हाॅं ! बशर्ते मुझसे वो कहते लजाकर ,

ज़िद पे अड़के , रूठके या मुस्कुराकर ,

है क़सम मुझको हथौड़े की जगह मैं ,

अपने सिर से संगेमरमर फोड़ देता ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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