दिल में बस इक-दो नहीं ग़म लाख पलते हैं ।।

ऑंख से ऑंसू न अलबत्ता निकलते हैं ।।

लोग घूमें घर में मोटर-कार में बैठे ,

और हम पैदल भी मीलों-मील चलते हैं ।।

हमसे फूलों का कुचलना भी नहीं होता ,

लोग लोगों को मकोड़ों सा मसलते हैं ।।

कड़कड़ाती सर्दियों की सिगड़ियों से कुछ ,

दोस्त अपने दोस्त से दिन-रात जलते हैं ।।

ऑंसुओं की आग से तो आजकल ताज़ा-

मोम जैसे लोग भी कम ही पिघलते हैं ।।

ग़म के मारे हो गए पत्थर के हम हाथी ,

इस ख़ुशी से वो बने बंदर उछलते हैं ।।

इस क़दर महॅंगाई में अब ग़म ग़लत करने ,

हम गरीबों के बमुश्किल जाम ढलते हैं ।।

हाल ए दिल तब कह न पाए जब थे वो क्वारे ,

वक़्त ए रुख़्सत उनके अब रो हाथ मलते हैं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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