मुक्तक : 1032 – पागल दुनिया

हम तलवारों से सब्जी-भाजी काटें , भालों से कपड़े सिलने का काम करें ।। पाॅंवों को हाथों में रख सिर से भागें , लेटे-लेटे काम खड़े आराम करें ।। ये सब देख चिढ़ाते हॅंस-हॅंस पड़ते हैं , यूॅं ही आ...Read more

∆ ग़ज़ल : 302 – ग़ज़लकार

मैं फिर कहता हूॅं मेरी बात पर करने यक़ीं साहिब ।। है बेशक़ शौक़ लिखने का मगर मैं हूॅं नहीं कातिब ।। न बोलें हम उसे बेगार तो क्या नाम दें कहिए ; किये जिसके कभी मिलते नहीं इन्आम या...Read more

मुक्तक : 1031 – “कूदो छत से”

पहले बोलो ” कूदो छत से ” , गर कूद पड़ूॅं तो मत झेलो ।। मुझको ख़ुद ला लाकर सब दो , फिर छीन-झपट वापस लेलो ।। जब तक है मेरे दम में दम ; तुम मेरे साथ रहो हरदम...Read more

मुक्तक : 1030 – हीर

तुम्हारी याद का इक ज़ह्र में बुझा कोई , न मुझमें तीर एक मुस्तक़िल गड़ा होता ।। कमी ही आती ग़म ए दिल में कुछ न कुछ पल-पल , जिगर का दर्द न फिर दिन-ब-दिन बड़ा होता ।। मगर किया...Read more

मुक्तक : 1029 – बेवुक़ूफ़

सोचता हूॅं कभी – कभार होश में पूरे , मुझको सबने ही बेवुक़ूफ़ क्यों बना डाला ? मैंने पाया जवाब लेके हाथ में अपने , एक बोतल शराब एक काॅंच का प्याला ।। जागती ऑंख को बड़े – बड़े दिखा...Read more

मुक्तक : 1028 – इश्क़

उदासी से है इस क़दर इश्क़ लब पर , ख़ुशी में भी हरगिज़ तबस्सुम न लाऊॅं ।। अज़ीज़ इस क़दर सख्त़ काॅंटे कि उसको , दूॅं सौग़ात तो नर्म क़ुर्तुम न लाऊॅं ।। सियह रात कर दोपहर जुगनू जाते ;...Read more