मुक्तक : 1038 – पागल

हुआ इक अजब हादिसा , ताज़ा-ताज़ा , कहीं कोई मुर्दा गड़ा ही गड़ा था ।। वाॅं सब मुॅंह को बैठे थे तालों सा लटका , मैं गर्दन उठा ऊॅंट जैसा खड़ा था ।। मुझे इस क़दर तब थी हॅंसने की...Read more