∆ ग़ज़ल : 304 – फूॅंककर

कोई गिर जाए तो फ़ौरन नहीं उठाता हूॅं ।। अपने क़दमों को बहुत सोच कर बढ़ाता हूॅं ।। मुझको रोने को बड़ी वज़्ह चाहिए लेकिन , क़हक़हे तो मैं बिना बात ही लगाता हूॅं ।। जब ज़बाॅं थकके मेरी चूर-चूर...Read more