कोई गिर जाए तो फ़ौरन नहीं उठाता हूॅं ।।

अपने क़दमों को बहुत सोच कर बढ़ाता हूॅं ।।

मुझको रोने को बड़ी वज़्ह चाहिए लेकिन ,

क़हक़हे तो मैं बिना बात ही लगाता हूॅं ।।

जब ज़बाॅं थकके मेरी चूर-चूर हो जाती ,

तब भी मैं दिल से किसी को नहीं बुलाता हूॅं ।।

टूट जाते हैं किसी तरह मेरे ख़्वाब अक्सर ,

ख़्वाब में भी न कभी ख़्वाब मैं सजाता हूॅं ।।

तज्रुबा है कि हॅंसें लोग-बाग ग़म सुन-सुन ,

मैं किसी को न कभी हाल-ए-दिल बताता हूॅं ।।

आग जलती न हो तो फूॅंककर जलाऊॅं मैं ,

आग लग जाए तो मैं फूॅंककर बुझाता हूॅं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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