∆ ग़ज़ल : 305 – वो पागल नहीं

है इक शख़्स जो पहले जंगल उगाता ।। उन्हें अपने हाथों से फिर ख़ुद जलाता ।। वो पागल नहीं पर रखे सर पे जूते , जहाॅं जाए सर के ही बल चलके जाता ।। दिए हैं ख़ुदा ने उसे हाथ...Read more