है इक शख़्स जो पहले जंगल उगाता ।।
उन्हें अपने हाथों से फिर ख़ुद जलाता ।।
वो पागल नहीं पर रखे सर पे जूते ,
जहाॅं जाए सर के ही बल चलके जाता ।।
दिए हैं ख़ुदा ने उसे हाथ दो-दो ,
मगर उनसे बस अपना सर वो खुजाता ।।
अभी तक हर इक ख़्वाब टूटा ही उसका ,
मगर ख़्वाब दर ख़्वाब अब भी सजाता ।।
वो ख़ुद अपनी राहों पे चलने से पहले ,
अजब शौक है तीखे काॅंटे बिछाता ।।
ख़ुशी तो मनाता है वो छकके पी-पी ,
वो मातम भी जी भरके पी-पी मनाता ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

This article has 2 comments

  1. Sunil sharma Reply

    #जूते
    जो दशकों चले साथ तेरे,
    जीवित हैं क्या वे जूते?
    जिन्होंने मंजिल तक पहुँचाया,
    कांटो से बचाया,
    ताप से पंजो को ढकायां,
    जिसने तेज-तेज दौड़ाया,
    इज्जत का एहसास कराया,
    अब भी जीवित हैं क्या वे जूते?
    सुनील शर्मा”उदय”

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