इक के बाद इक इश्क़ की हारे गया मैं बाज़ियाॅं ।।
और वाॅं करते रहे वो शादियों पे शादियाॅं ।।
दिल तो मिलना दूर इज़हार ए मोहब्बत पर मुझे ,
उनकी जानिब से मिली है गालियों पर गालियाॅं ।।
उनकी रग-रग में ख़ुशी दौड़े हिरन सी कूदती ,
जोंक सी नस-नस में मेरी रेंगतीं नाराज़ियाॅं ।।
मुझको ले उनमें तुनुक भी बेक़रारी थी कहाॅं ,
मुझमें ही थीं उनको लेकर हर तरफ़ बेताबियाॅं ।।
होशियारी से वो अपनी आस्माॅं पर छा गए ,
रह गया गड़कर ज़मीं में करके मैं नादानियाॅं ।।
मर्हबा कहता था जो छोटी से छोटी बात पर ,
अब बड़ी बातों पे भी देता नहीं शाबाशियाॅं ।।
अपनी मर्ज़ी से ही मैं हूॅं क़ैद जिसमें तुम उसे ,
शौक़ से बोलो क़फ़स मेरा तो है वो आशियाॅं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *