∆ ग़ज़ल : 307 – मैं ही जानता हूॅं

इस बात को फ़क़त मैं ही जानता हूॅं यारों ।। गिर-गिर के ही मैं इतना ऊॅंचा उठा हूॅं यारों ।। धोखा किया है उनसे मैंने ही पर मुझे वो , जानूॅं न क्यों न माने मैं बेवफ़ा हूॅं यारों ?...Read more