इस बात को फ़क़त मैं ही जानता हूॅं यारों ।।

गिर-गिर के ही मैं इतना ऊॅंचा उठा हूॅं यारों ।।

धोखा किया है उनसे मैंने ही पर मुझे वो ,

जानूॅं न क्यों न माने मैं बेवफ़ा हूॅं यारों ?

हरगिज़ न होंगे मुझको वो दस्तयाब लेकिन ,

मैं सिर्फ़ ओ सिर्फ़ उनको ही चाहता हूॅं यारों ।।

बाहर से मैं हूॅं जितना अच्छा न कोई जाने ,

अंदर से ठीक उतना ही मैं बुरा हूॅं यारों ।।

चेहरे पे मेरे दिखते झरने , तलाब , नदियाॅं ,

दिल में मैं सूखे जंगल सा जल रहा हूॅं यारों ।।

कुछ मंज़िलें रुके बिन दिन रात चल मिली हैं ,

कुछ-कुछ मक़ाम बैठे भी पा गया हूॅं यारों ।।

( फ़क़त = केवल / दस्तयाब = उपलब्ध / मक़ाम = मंज़िल )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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