मुक्तक : 1042 – क्यों ?

गंगा की धार में कुछेक मोड़-माड़कर , मुट्ठी में दाबे तैरकर बहाने को चला ।। जलती चिता में बच गए वो फाड़-फूड़कर , थैले में रख दबा-छुपा जलाने को चला ।। जाॅं से कहीं ज़ियादा जो सॅंभाल कर रखे ;...Read more