गंगा की धार में कुछेक मोड़-माड़कर ,
मुट्ठी में दाबे तैरकर बहाने को चला ।।
जलती चिता में बच गए वो फाड़-फूड़कर ,
थैले में रख दबा-छुपा जलाने को चला ।।
जाॅं से कहीं ज़ियादा जो सॅंभाल कर रखे ;
तनहाई में हमेशा चूम-चामकर पढ़े ;
तेरे उन्हीं ख़तों के हर्फ़-हर्फ़ आज मैं ,
पूरे हवास ओ होश रख मिटाने को चला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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