जाने क्या हासिल हुआ या खो गया या छिन गया ,

तर्ज़ो अंदाज़ आजकल सब खा गया पलटा मेरा ?

पाॅंवों से करता हूॅं अपने सब के सब ही काम मैं ,

कारवाॅं दिन-रात अनथक हाथों से चलता मेरा ।।

जब ज़ुबाॅं चुप ऑंख फिर सब कुछ बयाॅं कब तक करे ?

बेसबब गुमसुम रहे दिल मग़्ज़े सर धक-धक करे ;

हाॅं ! किसी को भी यक़ीं होगा न लेकिन सच है ये ,

बोलते अब कान मेरे और मुॅंह सुनता मेरा ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *