मुक्तक : अश्क़बारी

हॅंसके जीने का अदाकार तो मैं हूॅं आला , पर मेरे दिल में ग़मों का गुबार पलता है ।। ख़ुद बख़ुद बज़्म में ज्यों क़हक़हे निकल जाऍं , वैसे ख़ल्वत में न टाले से रोना टलता है ।। सब ये...Read more

प्रतीक्षा

छिपकली की कभी तो कटी पूॅंछ सा , तो कभी ज़िंदा फन कुचले इक साॅंप सा , कुछ घड़ी को नमक में गिरी जोंक सा , कुछ पहर रेत पर नीर बिन मीन सा ; लौट कर मुझसे आने की...Read more

∆ ग़ज़ल : 308 – किर्दार

लाश का किर्दार यूॅं मैंने निभाया ।। मुझको सब ने मिलके ज़िंदा जा गड़ाया ।। धूप में रोटी पकाऊॅं क्योंकि सबने , जब जलाया मैंने चूल्हा आ बुझाया ।। उससे शादी हो नहीं सकती थी तब ही , उस हसीना...Read more

मुक्तक : 1045 – क्यों ?

ये मेरा दिल जो है पत्थर का खुश्क़ ऑंखों से , पिघल-पिघल के निकलता ही हाय ! जाए क्यों ? बिछुड़ते वक़्त भी रोया न था जो इक ऑंसू , वो आठ-आठ बड़े अश्क़ आज ढाए क्यों ? बहुत दिनों...Read more