मुक्तक : 1045 – क्यों ?

ये मेरा दिल जो है पत्थर का खुश्क़ ऑंखों से , पिघल-पिघल के निकलता ही हाय ! जाए क्यों ? बिछुड़ते वक़्त भी रोया न था जो इक ऑंसू , वो आठ-आठ बड़े अश्क़ आज ढाए क्यों ? बहुत दिनों...Read more