ये मेरा दिल जो है पत्थर का खुश्क़ ऑंखों से ,

पिघल-पिघल के निकलता ही हाय ! जाए क्यों ?

बिछुड़ते वक़्त भी रोया न था जो इक ऑंसू ,

वो आठ-आठ बड़े अश्क़ आज ढाए क्यों ?

बहुत दिनों से जिसे फ़ुर्सतों में भी भूले ,

किया न याद न ख़ुद ही जो याद आया था ;

अजीब है वो ही मस्रूफ़ियत में रह-रहकर ,

बुरी तरह से लगातार याद आए क्यों ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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