∆ ग़ज़ल : 308 – किर्दार

लाश का किर्दार यूॅं मैंने निभाया ।। मुझको सब ने मिलके ज़िंदा जा गड़ाया ।। धूप में रोटी पकाऊॅं क्योंकि सबने , जब जलाया मैंने चूल्हा आ बुझाया ।। उससे शादी हो नहीं सकती थी तब ही , उस हसीना...Read more