लाश का किर्दार यूॅं मैंने निभाया ।।

मुझको सब ने मिलके ज़िंदा जा गड़ाया ।।

धूप में रोटी पकाऊॅं क्योंकि सबने ,

जब जलाया मैंने चूल्हा आ बुझाया ।।

उससे शादी हो नहीं सकती थी तब ही ,

उस हसीना पर न दिल मैंने लुटाया ।।

उस पर मेरा क़र्ज़ था बस इसलिए ही ,

उसको हर इक बार मरने से बचाया ।।

सब ही की ताकीद थी ” मत इश्क़ करना “,

ख़ुद को बस मैंने नहीं पत्थर बनाया ।।

कब विरासत में मुझे सूरज मिले थे ,

रोशनी को मैंने ख़ुद को ख़ुद जलाया ।।

कौन है बेचा हो जिसने उम्र भर दूध ,

और इक दिन भी न हो पानी मिलाया ?

( किरदार = चरित्र / ताकीद = हठ )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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