छिपकली की कभी तो कटी पूॅंछ सा ,

तो कभी ज़िंदा फन कुचले इक साॅंप सा ,

कुछ घड़ी को नमक में गिरी जोंक सा ,

कुछ पहर रेत पर नीर बिन मीन सा ;

लौट कर मुझसे आने की खाकर क़सम ,

जब चले आए थे छोड़कर मुझको तुम ,

जिस जगह ; उस जगह ही मैं अब तक खड़ा ,

अपनी नज़रें दरी सी बिछाए हुए ,

बाट जोहूॅं तुम्हारी तड़पता हुआ ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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